70 का दशक हिंदी फिल्म उद्योग के लिए एक सुनहरा दौर था, जिसमें नए विचारों, नए प्रयोगों और एक्शन तथा अपरंपरागत फिल्मों की एक नई शैली सामने आई थी: राहुल रवैल

भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के 51वें संस्करण में वार्तालाप के दौरान

“उन दिनों में फिल्मी सितारों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी। हर अभिनेता एक-दूसरे से बढ़-चढ़ कर काम कर रहा था, लेकिन कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होती थी।”

ब्रज पत्रिका। हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1970 के दशक में नए विचारों, नए प्रयोगों और एक्शन फिल्मों की एक नई शैली का प्रवाह देखा गया। यह समय ऐसा था जिसे गैर-पारंपरिक फिल्मों के लिए स्वर्णिम वर्ष कहा जाता है, क्यूंकि इसी दौरान भारतीय सिनेमा में नई तकनीक का आगाज भी हुआ था।

फिल्म निर्माता राहुल रवैल ने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव-आईएफएफआई के 51वें संस्करण में आज वर्चुअल वार्तालाप के दौरान यह बात कही। उन्होंने आईएफएफआई में आज 50, 60 और 70 के दशक में बनने वाली फिल्मों के निर्माण पर चर्चा की, राहुल रवैल ने बीते दौर में हिंदी फिल्म उद्योग के विकास की अद्भुत यात्रा के बारे में वर्चुअल रूप से भाग लेने वाले प्रतिनिधियों से चर्चा की। 

अपने सिनेमाई सफर को याद करते हुए फिल्म-निर्माता राहुल रवैल ने कहा कि,

“उन्होंने 60 के दशक के अंत से फिल्म जगत में काम करना शुरू कर दिया था और दिग्गज राज कपूर के सहायक के रूप में अपना करियर प्रारंभ किया। के. आसिफ और महमूद जैसे कलाकारों ने 60 के दशक में शानदार सेटों के साथ फिल्में बनाईं, इसके बाद 70 के दशक में बाबूराम ईशारा की फिल्म ‘चेतना’ की लोकेशन पर हुई शूटिंग 25 से 30 दिनों में ही पूरी कर ली गई, जिससे हिंदी सिनेमा में एक क्रांति की शुरुआत हुई और उन दिनों ये बात बेहद असाधारण थी।”

श्री राहुल रवैल ने कहा कि,

“विजय आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’, जिसमें देव-आनंद मुख्य अभिनेता थे। उस फिल्म ने भी 70 के दौर में एक्शन-ओरिएंटेड, बड़े प्लॉट वाली फिल्मों के एक नए रूप को जन्म दिया। जिस समय हिंदी फिल्म-उद्योग में कारोबार तेजी से बढ़ रहा था, तब 70 के दशक में फिल्म ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाए गए किरदार के रूप में एक ‘अपरंपरागत नायक’ देखा गया था। इसने ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि को दर्शकों के सामने रखा और फिर एक नया ब्रांड स्थापित हुआ।”

राहुल रवैल ने बताया कि,

“1973 में नासिर हुसैन की फिल्म ‘यादों की बारात’ आई, जिससे एक बेहतरीन स्क्रिप्ट के साथ सलीम-जावेद की जोड़ी का आगमन हुआ। राज कपूर ने ‘बॉबी’ के ज़रिये ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया को पेश किया, इस फिल्म ने भी एक नया चलन शुरू किया।”

उन्होंने कहा कि,

“ये फिल्में एक बदलाव ला रही थीं और फिल्म बनाने के पूरे तालमेल में इजाफा कर रही थीं।”

ऋषि कपूर को याद करते हुए श्री रवैल कहते हैं,

“उन दिनों वह कम उम्र के अभिनेता थे। फिल्म स्टार जितेन्द्र भी हिंदी सिनेमा की दुनिया में एक नई अपील और नई शैली के साथ बड़े पर्दे पर सामने आए।”

वर्चुअल वार्तालाप के इस मौके पर राहुल रवैल ने फिल्म ‘दीवार’ को भी याद किया – यह शानदार ढंग से बनाई गई एक फिल्म थी जो यश चोपड़ा को उस दौर में महान ऊंचाइयों पर ले गई। यश चोपड़ा ‘त्रिशूल’ जैसी और भी यादगार फिल्मों के साथ आगे बढ़े।

श्री रवैल ने याद करते हुए बताया कि,

“उन दिनों फिल्मी सितारों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी। हर अभिनेता एक-दूसरे से बढ़-चढ़ कर काम कर रहा था, लेकिन कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होती थी।”

एक मज़ेदार घटना को याद करते हुए उन्होंने बताया कि,

“एक बार तीन धुरंधर अभिनेता राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार किसी रेस्तरां में मिले, वे एक-दूसरे के पास आए और गुज़रे दिनों तथा एक-दूसरे की फिल्मों के बारे में अंतरंग दोस्तों की तरह बातें करने लगे।”

श्री रवैल ने एक और दिलचस्प किस्सा सुनाया कि, किस प्रकार से महान सचिन देव बर्मन ने बड़ी विनम्रता से कहा था कि, ‘लैला मजनू’ के लिए संगीत देना उनके लिए सही नहीं है और इस काम के लिए उन्होंने मदन मोहन की सिफारिश की। एक शानदार फिल्म बनाने के लिए संगीत निर्देशक, महान गायक और गीतकार निर्देशक के साथ बैठकर कहानी को जानेंगे और अभिनेता भी इसमें सहयोग करेंगे, जिन्हें लिप-सिंक करना है। 

फिल्म-निर्माता राहुल रवैल ने एक और महान फिल्म, एल. वी. प्रसाद की ‘एक दूजे के लिए’ का भी ज़िक्र किया, जिसमें एक ऐसी प्रेम कहानी सामने लाई गई थी,

“जहां नायक हिंदी नहीं बोल पाता था, और केवल तमिल बोलता था, जबकि नायिका केवल हिंदी में बात कर सकती थी, उसे तमिल नहीं आती थी।”

उन्होंने कहा कि,

“लोग आविष्कार कर रहे थे और विभिन्न प्रकार के नये-नये काम कर रहे थे।”

दर्शकों को अलग – अलग प्रकार की नई फिल्मों का भी अनुभव हो रहा था। यह 80 के दशक में किया गया जब ज़्यादातर नए लोग सिनेमा में आए, हालांकि पुराने धुरंधर अभी भी वहां थे। 80 के दशक में सुभाष घई और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे दिग्गजों का आना देखा गया। जब उस वक़्त रवैल ने फिल्म ‘अर्जुन’ को बनाया, तो एक नया चलन शुरू किया गया, जहां पर किसी कहानी को नहीं, बल्कि चरित्र को तवज्जो दी गई।

राहुल रवैल ने उस याद को साझा करते हुआ बताया कि,

“जावेद अख्तर ने 8 घंटे में ही ‘अर्जुन’ की पटकथा लिखी थी। रवैल ने खलनायक की भूमिका के लिए लोकप्रिय अमजद खान को भी एक हास्य भूमिका में प्रस्तुत करने का फैसला लिया। हालांकि कई लोग उनके इस फैसले के बारे में उलझन में थे, लेकिन राहुल रवैल ने अपने गुरु राज कपूर की सलाह को याद रखा कि ‘एक महान स्क्रिप्ट हमेशा काम करेगी’ और इसके साथ चलते चलो।”

अंत में, राहुल रवैल ने कहा कि,

“70 और 80 का दशक वह दौर था जब भारतीय फिल्म उद्योग बहुत आगे बढ़ गया था और यह अभी भी बढ़ रहा है।”

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