कला भूमि ‘ब्रज’ की लौटने लगी रौनक, गुलज़ार होने लगी कलाकारों की दुनिया

डॉ. महेश चंद्र धाकड़

ब्रज की भूमि लीलाधर श्री कृष्ण की जन्म स्थली है, जो कि 16 कलाओं से परिपूर्ण माने जाते हैं। अपने ब्रज को कलाओं की भूमि भी माना जाता है। यह जितना धर्म और अध्यात्म का  गढ़ रहा है, उतना ही कलाकारों का भी। चाहे बात करें, स्वामी श्री हरिदास जी की और चाहे बात करें महाप्रभु बल्लभाचार्य जी की। ब्रजभूमि में एक से बढ़कर एक नायाब साहित्य-कला साधक शख्शियतों ने जन्म लिया। आज ब्रज की भूमि, कला और साहित्य के लिए बेहद उपजाऊ है। मौजूदा दौर की बात करें तो मथुरा-वृंदावन भगवान श्री कृष्ण की रासलीलाओं पर आधारित रास मंडलियों के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ के कलाकार विदेशों तक में ब्रज की रासलीला का प्रदर्शन करके जीविकोपार्जन करते हैं। देश के हर हिस्से में ब्रज की ये रास मंडलियाँ जाती हैं।
कोविड-19 वायरस के प्रकोप ने इन मंडलियों के कलाकारों से उनका रोजगार छीन लिया। इनके लिए खुद के अस्तित्व को इस माहौल में बचाये रखना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। मौजूदा दौर में जब एक तरफ महामारी फैलने का डर सबको सता रहा है, वहीं सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन्स का अनुपालन करते हुए किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम को अंज़ाम तक पहुँचाना भी कम मुश्किल काम नहीं रह गया है। हालांकि अब जबकि वैडिंग इवेंट्स के लिए इवेंट मैनेजर सक्रिय हो रहे हैं, रफ्ता-रफ्ता कलाकारों के कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं। कलाकारों में खुशी की लहर व्याप्त होने लगी है। रोजी-रोटी के लिए कला पर ही निर्भर कलाकारों की दुनिया गतिविधियों के साथ गुलज़ार हो उठी है।
ब्रज के गांव मुखरई को कौन नहीं जानता? जहाँ के ज्यादातर घरों के बच्चे रामलीला, कृष्णलीला और रासलीला मण्डलियों में बतौर कलाकार काम करते हैं। कुछ बच्चे तो ऐसे हैं जो कि अपने-अपने परिवार के लिए आय के मुख्य जरिया हैं यानि ये बाल कलाकार जब काम करते हैं, तभी जाकर उनके घरों का चूल्हा जलता है। इसीलिए इन वैडिंग इवेंट्स का फिर से शुरू होना बेहद जरूरी था। खुशी की बात है लोगों ने अपने-अपने शादी-विवाह समारोहों में सरकारी गाइड लाइंस का अनुपालन करते हुए, कम मेहमानों के शादी-विवाह समारोहों में भी अब कलाकारों को बुलाना शुरू कर दिया है। इनसे इनके चेहरों की रौनक भी लौटने लगी है।
इसी प्रकार अगर हम अपने आगरा की बात करें तो इस वक़्त आगरा गायकों, नृत्य कलाकारों और ऐंकर्स के लिए पहचाना जाने लगा है, यहाँ से ये कलाकार अब अच्छा-खासा बाहर भी काम पाने लगे हैं। अब वैडिंग के इवेंट्स के शुरू होने से इनके चेहरों की उदासी भी दूर होने लगी है। उनकी लॉक डाउन बाद की अब शुरुआत उत्साहजनक है। इसीलिए खुशी का इज़हार करते हुए कलाकार सोशल मीडिया पर इवेंट्स की जानकारी पोस्ट करते भी दिख रहे हैं। सांस्कृतिक क्षेत्र से जीविकोपार्जन करने वाले कलाकारों के लिए लॉक डाउन बहुत मुश्किलभरा वक़्त रहा था, जिसकी कटु यादें दिलों में हमेशा ही बनी रहेंगी। लिहाज़ा बदलाव सुखद है।
सावन का महीना दस्तक दे रहा है। मुम्बई से लेकर अपने ब्रज के विभिन्न शहरों तक कलाकारों के बीच उदासी के बादल छंट रहे हैं, क्योंकि कामकाज की बूंदाबांदी शुरू हो गयी है। इसी शुरुआत ने जहां एक तरफ आम इंसान की जिंदगी में रंग भरने का काम किया है, वहीं कलाकार की जिंदगी की उड़ी-उड़ी सी रंगत को फिर से सतरंगी बनाने का काम किया है। इन ब्रज के कलाकारों के लिए ये शुरुआतें छोटी भले ही सही, मगर उनके हौसलों को बुलंद करने वाली हैं। इन बदले हुए हालातों का ये असर लंबे समय तक हमारे मानवीय समाज को ताज़ा ऊर्जा देने को सार्थक सिद्ध होगा।

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