अंधी दौड़ से बाहर निकलो, न्यूनतमवाद को अपनाओ-शशांक उदापुरकर

‘प्रवास’ ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपना ‘क्यों’ महसूस करता है और पाता है कि उसके पास पृथ्वी पर रहने के लिए बहुत कम समय बचा है: निर्देशक शशांक उदापुरकर

ब्रज पत्रिका। “पहले, हम पूरी दुनिया को एक परिवार मानते थे: वसुधैव कुटुम्बकम। लेकिन अब, परिवार को भी परिवार नहीं माना जाता है। हमें अंधी दौड़ को रोकना होगा; हमें खुश रहना है और महसूस करना है कि हम केवल दूसरों की मदद करके खुश रह सकते हैं।” यह संदेश मराठी फिल्म ‘प्रवास’ के निर्देशक शशांक उदापुरकर द्वारा दिया गया।

‘प्रवास’ को 51 वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के भारतीय पैनोरमा फीचर फिल्म खंड के तहत प्रदर्शित किया गया। फिल्म जीवन यात्रा को दिखाती है और मानव जीवन के मुख्य मुद्दों पर जोर देती है। यह फिल्म प्रतिष्ठित आईसीएफटी यूनेस्को गांधी मेडल के लिए भी प्रतिस्पर्धा में है, जो महात्मा गांधी के शांति, सहिष्णुता और अहिंसा के आदर्शों को दर्शाने वाली आईएफएफआई फिल्म को दिया जाता है। महोत्सव में फिल्म के प्रदर्शन के बाद निर्देशक आज 23 जनवरी, 2021 को गोवा में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

‘प्रवास’ एक बुजुर्ग दंपति – अभिजात इनामदार और लता की यात्रा का वृतांत है। अभिजात साठ की उम्र को पार कर चुके हैं, और अस्वस्थ हैं। उनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं, और उनका जीवित रहना डायलिसिस पर निर्भर करता है, जिसे उन्हें सप्ताह में दो बार कराना पड़ता है। उन्हें जीवन में बहुत पछतावा है, और उनका मानना ​​है कि उनका जीवन समाप्त हो चुका जैसा है। लता ने स्थिति से समझौता कर लिया है। फिर एक दिन, उन्हें अहसास होता है, और वे अपने जीवन में एक नया दौर शुरू करते हैं।

अभिजीत को महसूस होता है कि ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें मदद की ज़रूरत है। वे उनकी समस्याओं में मदद करना शुरू कर देते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, संतुष्टि का भाव आता है और उन्हें एक बहुत ही अनोखी पहचान देता है।

‘प्रवास’ के निर्देशक शशांक उदापुरकर ने कहा कि,

“फिल्म हमें याद दिलाती है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास इस धरती पर सीमित समय है और यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई अपना जीवन कैसे जीता है। इस भौतिकवादी दुनिया में, हम एक अंधी दौड़ में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यह कहा जाता है कि आपके जीवन में दो महत्वपूर्ण दिन होते हैं; एक, जिस दिन आपका जन्म हुआ है, और दूसरा, जिस दिन आपको पता चलता है कि क्यों। प्रवास ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे यह पता चलता है कि उसके पास बहुत सीमित समय है। नायक अभिजीत एक आम आदमी जैसा है। वह हमें सिखाता है कि जब आप दूसरों की मदद करते हैं और अपना जीवन सार्थक रूप से जीते हैं, तो आप पृथ्वी पर सबसे खुश व्यक्ति होते हैं।”

वे कहते हैं कि,

“आपको अपने दिल की बात सुननी चाहिए, प्रवास भी यही सन्देश देता है।”

यह सवाल पूछने पर कि कोई अंधी दौड़ से अलग कैसे हो सकता है, शशांक ने न्यूनतमवाद को अपनाने का आग्रह किया।

“हम अंधी दौड़ में हैं, न्यूनतमवाद समय की जरूरत है। आधुनिक दुनिया में, विभिन्न विकल्प हमें बाध्य करते हैं। उदाहरण के लिए, हमें बताया जाता है कि हमें साल में दो बार अपने मोबाइल फोन को बदलने की जरूरत है। यह संस्कृति हमें और अधिक चाहने के लिए प्रेरित करती है। मांगों को कम करना ही इससे बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है।”

बड़ी संख्या में लोग इस मार्ग का अनुसरण क्यों नहीं करते हैं? उदापुरकर का जवाब है:

“केवल एक गांधी हैं। इसी तरह, बहुत कम लोग हैं, जो न्यूनतमवाद का पालन करते हैं। यह बहुत ही सरल और बहुत कठिन दोनों है। न्यूनतमवाद के पथ का अनुसरण करना एक कठिन कार्य है।”

शशांक उदापुरकर ने ‘धवा धव’ और ’कर्तव्य’ जैसी मराठी फिल्मों में मुख्य अभिनेता के रूप में काम किया है। ‘अन्ना’ निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म थी और प्रवास उनकी दूसरी फिल्म है। उन्होंने पटकथा और संवाद लेखक के रूप में भी काम किया है।

आईएफएफआई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म टेलीविजन और ऑडियोविजुअल संचार परिषद, (आईसीएफटी) पेरिस के साथ मिलकर एक विशेष आईसीएफटी पुरस्कार – यूनेस्को गांधी मेडल – प्रदान करता है। यूनेस्को ने 1994 में महात्मा गांधी के जन्म की 125 वीं वर्षगांठ के अवसर पर स्मारक पदक जारी किया था। तब से आईसीएफटी यूनेस्को गांधी पुरस्कार एक ऐसी फिल्म को दिया जाता है, जो महात्मा गांधी के शांति, सहिष्णुता और अहिंसा के आदर्शों को सबसे अच्छी तरह से दर्शाती है। महोत्सव के इस संस्करण में प्रवास समेत दस फिल्में पदक के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।

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