नृत्य न केवल हमें आध्यात्मिकता से जोड़ता है, बल्कि यह शारीरिक और मानसिक रूप से भी मनुष्य को स्वस्थ और चुस्त बनाए रखता है
विश्व नृत्य दिवस के उपलक्ष्य में नृत्य ज्योति कथक केंद्र द्वारा सांस्कृतिक संध्या और कला संवाद का भव्य आयोजन।
ब्रज पत्रिका, आगरा। घुंघरुओं की मधुर झंकार और भावों की गहराई ने जब वातावरण को स्पंदित किया, तो लगा जैसे नृत्य केवल कला नहीं, आत्मा की भाषा बन गया हो। विश्व नृत्य दिवस के अवसर पर आगरा में नृत्य की इसी आध्यात्मिक शक्ति का जीवंत और भव्य प्रदर्शन देखने को मिला। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं की विशेषता उनकी आध्यात्मिकता और भावों की विविधता में निहित है। इन्हें ‘रस’ की अभिव्यक्ति माना जाता है, जो ईश्वर से संवाद का माध्यम बनती है। यह पश्चिमी नृत्य शैलियों से अलग है, जो मुख्यतः शारीरिक लय और ताल पर आधारित होती हैं।
विश्व नृत्य दिवस के उपलक्ष्य में ब्रह्माकुमारीज के कला व संस्कृति प्रभाग और नृत्य ज्योति कथक केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में ईदगाह में एक भव्य नृत्य संध्या एवं कला संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ बीके अश्विना बहन, बृज खंडेलवाल, डॉ. ज्योति खंडेलवाल, बीके अमर भाई, देवाशीष गांगुली सहित अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन और ध्यान योग के साथ किया गया।

सर्वप्रथम नृत्य ज्योति कथक केंद्र के बच्चों ने शिव वंदना, संदेशात्मक नृत्य, कथक तराना और राजस्थानी लोकनृत्य जैसी मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं, जिन्होंने सभी दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। पाखी, अद्विका, अविका, पीहू, आध्या, आरना, दर्शना, प्रज्ञा, मोनिष्का, चांदनी, निमिषी, शालू, अवनी, अविशी, अंशिका, अक्षयिनी, कनिष्का आदि प्रतिभाशाली बच्चों ने अपनी प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कलाकारों, संस्कृति प्रेमियों और शहर के प्रबुद्धजनों ने भाग लिया। इस अवसर पर एक विचारोत्तेजक कला संवाद भी आयोजित किया गया, जिसका विषय था “नृत्य का बदलता स्वरूप-अभिव्यक्ति, प्रदर्शन और डिजिटल युग की दुविधा।”
कला संवाद में बीके अश्विना बहन, डॉ. ज्योति खंडेलवाल, डॉ. मनु शर्मा, डॉ. रश्मि खंडेलवाल, सुश्री आंचल जैन (भरतनाट्यम गुरु) और अजीत सिंह (नृत्य कोरियोग्राफर) ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए।


वक्ताओं ने कहा कि,
“नृत्य न केवल हमें आध्यात्मिकता से जोड़ता है, बल्कि यह शारीरिक और मानसिक रूप से भी मनुष्य को स्वस्थ और चुस्त बनाए रखता है।”
साथ ही, डिजिटल युग में नृत्य की अभिव्यक्ति और प्रस्तुति के बदलते स्वरूप पर भी गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया।
वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार और कला समीक्षक डॉ. महेश धाकड़ ने कहा कि,
“परंपराओं के साथ आधुनिकता को भी अंगीकार करना चाहिए, लेकिन संस्कृति की शुद्धता के साथ ही उसे अपनाया जाना चाहिए। नृत्य की दुनिया में तमाम परिवर्तन हो रहे हैं उनसे परहेज न करें लेकिन कलाओं का मौलिक स्वरूप बरकरार रहे यह ध्यान रखा जाना चाहिए। आज फिटनेस के लिए भी नृत्य उपयोगी साबित हो रहा है, जुंबा, किजुंबा, एक्वा जुंबा सहित कई नृत्य शैलियां हैं जो फिटनेस डांस की हैं। साहित्य और सिनेमा दोनों ही समाज में परिवर्तन लाते हैं। नृत्य को फिल्मों ने भी काफी तवज्जो दी है, जिसके चलते नृत्य की दुनिया का वैश्विक विस्तार हुआ है। हमें पश्चिमी नृत्य शैलियों से कोई परहेज क्यों जब विदेशी युवा भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों को अपना रहे हैं। भारतीय कलाकारों के विदेशी भी दीवाने हैं। कोई भी नई चीज आती है तो उसका आंख मूंदकर विरोध नहीं किया जाना चाहिए।”
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में संतोष व्यक्त किया कि,
“युवा पीढ़ी तेजी से नृत्य की ओर आकर्षित हो रही है, चाहे वह शास्त्रीय हो या समकालीन। आज कई नृत्य अकादमियां खुल रही हैं, माध्यमिक स्तर पर नृत्य को एक विषय के रूप में शामिल किया जा रहा है, और फिल्मों ने भी नृत्य को व्यापक लोकप्रियता दिलाई है। इससे नृत्य कलाकारों के लिए नए अवसरों के द्वार खुल रहे हैं। विश्व नृत्य दिवस का यह आयोजन न केवल कला का उत्सव था, बल्कि यह इस बात का भी संकेत था कि नृत्य आज समाज में नई ऊर्जा, चेतना और पहचान के साथ उभर रहा है।”
इस अवसर पर वरिष्ठ संगीत गुरू डॉ. अमिता त्रिपाठी एवं वरिष्ठ तबला गुरू रविंद्र सिंह को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्रुति सिन्हा ने प्रभावशाली ढंग से किया, जबकि विशाल झा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम में प्रहलाद अग्रवाल, रिमझिम सचदेवा, रिद्धि गुप्ता, आरती शर्मा, अंजली वर्मा, इदित्रि गुप्ता, डॉ. विनीता गुप्ता, दिलीप अग्रवाल, किरण, पद्मिनी अय्यर, निधि पाठक, चतुर्भुज तिवारी, टोनी फास्टर सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

